वेद भारतीय सभ्यता के आदि ग्रन्थ हैं, ऐसा “कुछ” लोग कहते
हैं। बचपन से यही सुनते रहे और मानते भी रहे। क्या करते? कोई विकल्प भी तो नहीं
था। विकल्प तो अब भी नहीं है। किन्तु तब के विकल्पाभाव और आज के विकल्पाभाव में
उतना ही अन्तर है जितना इतिहासकारों और भारतीय समाजशास्त्रियों की दृष्टि में युवा-भारत
और तथाकथित असभ्य (uncivilized) प्राचीन भारत की जीवन-शैलियों और विधि-संहिताओं में। बचपन में
विकल्पाभाव कोई प्रतिद्वन्द्वी न होने से सत्तावान् था, किन्तु आज का विकल्पाभाव दृढ़-संकल्प
की सत्ता का परिचायक है।
सम्भव है भाषा में उलझाव सा प्रतीत हो रहा हो। ऐसा होना
स्वाभाविक है। उलझावों का युग है, तो जब तक सब कुछ उलझा हुआ सा न लगे तब तक बुद्धि
का आत्मसम्मान गौरव नहीं प्राप्त कर पाता। आत्मसम्मान भी अस्तित्व की अपेक्षा तो
रखता ही है। भले ही आधार बुद्धि क्यों न हो?
उलझावों के युग में आत्मसम्मान का मान बढ़ जाता है। क्योंकि
यही वो एक तत्त्व है जो सहजता से अभिज्ञप्त (identify) हो
जाता है, शेष सब कुछ तो उलझा हुआ ही रहता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि विचारों
का उलझाव मानसिक उलझन का प्रतीक है। यह तो युवा-भारत की प्रतिष्ठा का मान-पत्र है।
जो विचारों से जितना अधिक उलझ सकता हो, अथवा जिसके विचार जितना अधिक उलझा सकते हों
वो युवा-भारत में उतना ही अधिक सम्मान-भाक् (respected) बन सकता है। तो मार्ग सहज है। विचारों से
उलझने या उलझाने के प्रयत्न में जुट जाइए। साधन ? सहज है, किन्तु मैं नहीं बता
सकता। भई मैं अपने आपको मूर्ख तो कहला सकता हूँ किन्तु असभ्य नहीं। नहीं
समझे......? जाने दीजिए।
अब इसे मैं आश्चर्य कहूँ या अपनी मतिमन्दता? किसी भी युग के समाज की विचारशीलता ही उस समाज
की गतिशीलता का आधार बनती है। इसे ही हम दूसरे शब्दों में उस समाज की “विधि-संहिता”
भी कहते हैं। प्राचीन भारत युवा-भारत की अपेक्षा निश्चय ही विचारहीन रहा होगा। उसकी
तथाकथित असभ्यता इसी तथ्य को प्रमाणित करती है। यदि ऐसा न होता तो भला उसे अलिखित,
मात्र वनवासी द्रष्टाओं द्वारा दृष्ट ग्रन्थों को अपनी विधि-संहिता बनाने में
लज्जा का अनुभव भी न होता क्या?
युवा-भारत क्योंकि उसी असभ्य प्राचीन भारत से निकला है, अतः
उसके वैचारिक उलझाव का प्रथम केन्द्र भी वही प्राचीन विधि-संहिता होनी थी। यह प्राचीन
अतीत से मिला अभिशाप है जो युवा-भारत के पैरों से चिपक सा गया है। अब इस मैल को
छुड़ाना तो उसका प्रथम और परम कर्तव्य बनता ही है न।
निश्चय ही युवा-भारत को मनु की सन्तान कहलाना हीन लगेगा जबकि इससे
अधिक उत्तम और सम्मानजनक अवधारणा स्वीकार की जा सकती हो। मनुष्य बन्दरों का
अत्यधिक उन्नत, सभ्य और विकसित रूप है। ये ठीक भी है। इसमें आत्मसम्मान का बोध
अधिक है। इस अवधारणा में किसी की कही हुई बातों को विधि-संहिता मान लेने का दासत्व-बोध
भी नहीं है। तो फिर जो पैरों से चिमट कर “मनुष्य” का तादात्म्य “मनु” से स्थापित
करने के लिए युवा-भारत के विचारों का चीरहरण सा करता प्रतीत होता रहता है वो क्या
है? क्योंकि वानरवाची किसी भी शब्द से “ मनुष्य, मानव या आदमी” शब्दों की
व्युत्पत्ति का कोई प्रमाण मिलता हो ऐसा संज्ञान में तो नहीं आया। व्युत्पत्ति का
यही उलझाव युवा भारत की उन्नति के सारे मार्गों को रोककर रख रहा है। उन्नति और
विकास युवा-भारत के सभ्य-प्रासाद के कपाटों को विदीर्ण कर प्रासाद में बलात्
प्रविष्ट हुए जा रहे हैं, किन्तु, खेद का विषय तो यह है कि इस भारत के पास कोई
विधि-संहिता नहीं है, जिससे वह उन्नति और विकास “पुरुष” का स्वागत कर सके।
किन्तु आश्चर्य है कि असभ्य भारत की विधि-संहिता को बिना
देखे, बिना समझे, बिना जाने और बिना माने अपने जड़ों से छुड़ाने में प्रयत्नशील
युवा-भारत के किसी समर्थ पुरुष में इतनी भी सामर्थ्य नहीं है कि द्वारों को
विदीर्ण कर चुके विकास से यह कह सके कि अभी तनिक रुको, मैं अपनी सभ्यता और जीवन के
लिए विधि-संहिता तो बना लूँ, कि अभी तो मेरी असभ्य जड़ों का अभिशाप-मोचन ही मेरी
विधि-संहिता बना हुआ है।
.....युवा और आधुनिक मानसिकता को झकझोरता यह लेख, वास्तव में आपके गंभीर, व्यवस्थित एवं व्यापक चिन्तन का परिणाम व परिचायक है। अपने मुख से स्प्ष्टतया कुछ न कहकर भी आपने केवल इशारा मात्र से सब कुछ कह दिया है। विषय को पूर्ण विवेक एवं विद्वत्तापूर्ण स्तरीय शैली में उपस्थापित किया गया है। भाषा थोड़ी सरल होती तो और भी अच्छा होता। कुल मिलाकर लेख पढ़कर मज़ा आ गया...।
ReplyDeletemain pramod ji se puri tarah sahmat hun...:)
ReplyDeleteयुवा-भारत? किस आधार पर? क्या युवा वर्ग की आबादी अधिक होने से? आज भारत का युवा दिग्भ्रमित अधिक हॆ... न जोश न ओज... बस केवल रोटी की जुगाड में पता नहीं कब होता दिन ऒर कब होती रात. अनेक आन्तरिक ऒर वाह्य समस्याओं के होने पर भी कभी-कभी केवल कॆंडिल-मार्च..... या सोशल मीडिया के द्वारा मन की भडास.... इन परिस्थितियों में तो आग लग जानी चाहिए थी... लेकिन कुछ तो नहीं. ह्जार वर्षों की दासता ने हमें मूर्दा बना दिया हॆं ऒर आप कहते हॆं युवा-भारत.... जिसको पता ही नही कि वो युवा हॆ. देश का शासन-प्रशासन तो बूढों के हाथ में, नीति-निर्धारण का अधिकार बूढों को. तब कॆसी ऒर किसकी विधि-संहिता.
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