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Thursday, 17 January 2013

ब्लॉक से ब्लॉग तक


मनुष्य होना भी विचित्र बात है। हो जाने पर जीते रहना भी विचित्र है। जीते हुए चुप रहना तो विचित्र है ही, बोलना उससे भी विचित्र है। क्योंकि हमारे समाज में मनुष्य होने की अनुभूति भी बोलते रहने से ही आती है। मौन तो मानो पशुओं का एकाधिकार (patent) हो गया है। हमें घिन आती है मौन रहने से। अरे नहीं, मैं सारे मानव समाज की अनुभूति की व्याख्या नहीं कर रहा हूँ। ये ब्लॉग मेरी अपनी डायरी है। सो ये अनुभूतियाँ भी केवल मेरा patent हैं। भई समय patent का है। यद्यपि यह पूर्णतः तर्कसंगत नहीं लगता, किन्तु कुछ भी बोलना सुने जाने की अपेक्षा करता है। तो इतना तो सब जानते हैं की सुनने का कॉपीराइट भी उसी के पास होता है जिसके पास मौन का। बोलने से मनुष्य होने का परमज्ञान प्राप्त हो जाने के पश्चात् कौन मूर्ख मौन रहकर स्वयं के लिए पशु उपाधि की कामना करेगा। ऐसा होना उस स्थिति में और भी कठिन हो जाता है जब हमें यह ज्ञान हो कि भारतवर्ष में मनुष्य होना हमें देवों के समकक्ष खड़ा करता है। वाणी को वशवर्तिनी मानना तो हमारी विरासत है। आदिकाल से हम इसी में तो निपुण होते आए हैं। एक यही वो क्रिया है जिसके लिए हमें कभी भी स्वयं को पात्रता का प्रमाण-पत्र नहीं देना पड़ा। मुझे नहीं पता कि महामुनि यास्क ने शब्दों का संग्रह कितने यत्नों और कितनी मर्यादाओं के साथ किया होगा, पर उनके यत्न को सार्थकता तो हमने ही दी है। इतना उपकार तो उन पर हमारा बनता ही है। अब ऐसे में किन शब्दों का प्रयोग हम कब, कहाँ, कैसे और किस सन्दर्भ में करें इसका ज्ञान हमें कम से कम यास्क से तो लेने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शब्दों का अर्थ वो नहीं होता जो शब्द बनाने वाला निर्धारित करे, अर्थ तो प्रयोक्ता का एकाधिकार हैं। और यास्क के उन शब्दों के प्रयोक्ता हम हैं। कुछ लोग ये भी कह सकते हैं की शब्दों और मनुष्य के बीच यास्क कहाँ से आ गये? ठीक भी है। शब्द तो प्रजापति ब्रह्मा के उच्छ्वास हैं। तब तो और ही आनन्द की बात है। क्योंकि मनुष्य तो प्रजापति ब्रह्मा की घोषित सन्तान है और पिता की सम्पत्ति पर तो पुत्रों का अघोषित अधिकार होता ही है। अब इस तथ्य पर भी कोई आपत्ति करे तो यह अतिवाद ही कहा जाएगा। कथ्य ये कि हम शब्दों के प्रयोग में उन्मुक्त हैं।
उक्त मार्ग पर चलते-चलते आधा जीवन बीत गया। आशा उन्माद जैसी लगने लगी, जब ज्ञात हुआ कि जीवन के उत्तरार्ध तक उक्त मार्ग के पथिक भी अपने लिए एक श्रोता तक न पा सके जो उनकी बात को सुन सका हो। आश्चर्य की सीमा ही न रही कि जो समझते रहे सब मिथ्या निकला! यदि श्रोता ही नहीं तो कथ्य का तथ्य तो अतथ्य ही रहा। तो क्या बोलना एकालाप का पर्यायवाची है? कदाचित् यही होगा। अब तक विश्वस्त न हो सका, किन्तु आधे जीवन जिस मार्ग पर चला उसे बदल अवश्य दिया। मैं अपनी आशा को किसी और के भाग की साँसें नहीं दे सकता था। अच्छा भी है! सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही गति करनी चाहिए।
परन्तु  प्रश्न अब भी वहीं है। शब्द तो हैं, तो इनका प्रयोक्ता भी होगा। तब तो श्रोता भी अवश्य होगा। किन्तु कौन?  मैं तो समझ गया किन्तु...........

1 comment:

  1. यदि श्रोता ही नहीं तो कथ्य का तथ्य तो अतथ्य ही रहा....

    sub kuch keh diya....

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